श्रृंगार और तुम

सलवार कमीज पहनकर,
आँखों में सुरमा लगाकर,
कानों में बाली पहनकर,
बालों को खुला छोड़कर,
सज-संवरकर जब मैंने आज आईना देखा,
तो बहुत सुंदर लग रही थी मैं। 
लेकिन ये बात,
उसने मुझसे कितने सालों से नहीं कही है 
जब खुद को सज-संवर कर आईने में देखा,
तो मैंने खुद से कहा—
"तू बिना उसके भी बहुत सुंदर लग रही है,
पर अगर वो होता, तो बात ही कुछ और होती।" 

अगर वो होता,
तो एकटक होकर मुझे देखता रहता।
कहता, “तुम पर बिंदी बहुत जचती है।”
मेरे ज़ुल्फ़ों में अपनी उँगलियाँ उलझा कर,
वो खुद ही उलझ जाता।
तो कभी मेरे बालों को कान के पीछे सहेजते हुए,
प्यार से मेरा नाम पुकारता। 

जब भी मैं इधर-उधर देखती,
मेरे गालों से टकरातीं ये बालियाँ,
और वो बस मेरी टकराती बालियों को देखता रहता।
फिर मैं अपनी आंखों का काजल थोड़ा उसे भी लगा देती। 
मैं उसे दुनिया की नज़रों से बचाती,
और वो मुझे अपनी नज़रों से ढक लेता। 

आज जब मैं सज-संवरकर आईने के सामने खड़ी हुई,
खुद को देख रही थी,
 अच्छी तो बहुत लग रही थी...
लेकिन अगर वो होता, तो बात ही कुछ और होती।
 मैं उसके सामने खड़ी होती,
और वो मुझे गले से लगा लेता।

~ sneha 

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